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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस: शान्ति से ओतप्रोत नारी युग के आगमन की शुरूआत हो चुकी है

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष लेख।
-डॉ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ।

संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के अनुसार सारे विश्व में प्रतिवर्ष 8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को सरकारी व गैर-सरकारी कार्यालयों के साथ ही शैक्षिक संस्थानों आदि में भी महिला सशक्तिकरण पर सारगर्भित चर्चायें, महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए व्याख्यान एवं महिलाओं का शान्ति स्थापना में दिये जा रहे योगदानों पर भी प्रकाश डाला जाता है। हमारा मानना है कि एक माँ के रूप में नारी का हृदय बहुत कोमल होता है। वह सभी की खुशहाली तथा सुरक्षित जीवन की कामना करती है। वेदों में नारी को ब्रह्मा कहा गया है। वेद के अनुसार जिस प्रकार प्रजापति संसार की रचना करते हैं, उसी प्रकार स्त्री मानव जाति की रचनाकार है।

‘आधी आबादी’ कही जाने वाली नारी के प्रति हिंसा लगातार बढ़ती ही जा रही है

यह अत्यन्त ही दुख की बात है कि अपने देश की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के विपरीत आज समाज में ‘आधी आबादी’ कही जाने वाली नारी के प्रति हिंसा लगातार बढ़ती ही जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं के प्रति बड़े पैमाने पर बलात्कार, छेड़छाड़, यौन अपराध, दहेज हत्या, बाल विवाह एवं शोषण जैसी सामाजिक बुराइयाँ लगातार बढ़ती जा रहीं हैं। वर्तमान समय में महिलाओं तथा छोटी बच्चियों पर होने वाले भेदभाव, शोषण एवं अत्याचार से विचलित होकर किसी ने कहा है कि विश्व में गर बेटियाँ अपमानित हैं और नाशाद हैं तो दिल पर रखकर हाथ कहिये कि क्या विश्व खुशहाल है?

महिलाओं के बिना परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं

अनेक महापुरूषों के निर्माण में नारी का प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान रहा है। कहीं नारी प्रेरणा-स्रोत तथा कहीं निरन्तर आगे बढ़ने की शक्ति रही है। प्राचीन काल से ही नारी का महत्व स्वीकार किया गया है। महर्षि दयानंद ने कहा था कि ‘‘जब तक देश में स्त्रियां सुरक्षित नहीं होगी और उन्हें, उनके गौरवपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित नहीं किया जायेगा, तब तक समाज, परिवार और राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है।’’ ”जहाँ स्त्रियों का आदर किया जाता है, वहाँ देवता रमण करते हैं और जहाँ इनका अनादर होता है, वहाँ सब कार्य निष्फल होते हैं।’’

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अगर धरती पर कहीं जन्नत है तो वह माँ के कदमों में है

महिला का स्वरूप माँ का हो या बहन का, पत्नी का स्वरूप हो या बेटी का। महिला के चारांे स्वरूप ही पुरूष को सम्बल प्रदान करते हैं। पुरूष को पूर्णता का दर्जा प्रदान करने के लिए महिला के इन चारों स्वरूपों का सम्बल आवश्यक है। इतनी सबल व सशक्त महिला को अबला कहना नारी जाति का अपमान है। माँ तो सदैव अपने बच्चों पर जीवन की सारी पूँजी लुटाने के लिए लालायित रहती है। मोहम्मद साहब ने कहा है कि अगर धरती पर कहीं जन्ऩत है तो वह माँ के कदमों में है।

सृष्टि के आंरभ से नारी अनंत गुणों की भण्डार रही है

सृष्टि के आंरभ से ही नारी अनंत गुणों की भण्डार रही है। पृथ्वी जैसी क्षमता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र जैसी गंभीरता, चंद्रमा जैसी शीतलता, पर्वतों जैसा मानसिक उच्चता हमें एक साथ नारी हृदय में दृष्टिगोचर होती है। वह दया, करूणा, ममता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है और समय पड़ने पर प्रचंड चंडी का भी रूप धारण कर सकती है। वह मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री भी है। नर और नारी एक दूसरे के पूरक है। नर और नारी पक्षी के दो पंखों के समान हैं। दोनों पंखों के मजबूत होने से ही पक्षी आसमान में ऊँची उड़ान भर सकता है।

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अपने बलिदानों से, युग इतिहास रचा रे, नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे: धैर्य, दया, ममता और त्याग चार ऐसे गुण हैं जो कि महिलाओं में पुरूषों से अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। वास्तव में माँ ही बच्चों की सबकुछ होती है। किसी ने महिलाओं के संबंध में सही ही कहा है कि:-

नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे। धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।

कभी मीरा, कभी उर्मिला, लक्ष्मी बाई। कभी पन्ना, कभी अहिल्या, पुतली बाई।

अपने बलिदानों से, युग इतिहास रचा रे। नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।

अबला नहीं, बला सी ताकत, रूप भवानी। अपनी अद्भुत क्षमता पहचानो, हे कल्याणी।

बढ़ो बना दो, विश्व एक परिवार सगा रे। नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।

महिला हो तुम, मही हिला दो, सहो न शोषण। अत्याचार न होने दो, दुष्टांे का पोषण।

अन्यायी, अन्याय मिटा दो, चला दुधारे। नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।।

21वीं सदी में सारे विश्व में नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत हो चुकी है

विश्व की आधी आबादी महिलाएं विश्व की रीढ़ हैं। सारे विश्व में आज महिलायें विज्ञान, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, न्याय, मीडिया, राजनीति, अन्तरिक्ष, खेल, उद्योग, प्रबन्धन, कृषि, भूगर्भ विज्ञान, समाज सेवा, आध्यात्म, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीकी, बैंकिग, सुरक्षा आदि सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों का बड़े ही बेहतर तथा योजनाबद्ध ढंग से नेतृत्व तथा निर्णय लेने की क्षमता से युक्त पदों पर आसीन हैं। 21वीं सदी में सारे विश्व में नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत हो चुकी है। -जय जगत्-

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Arvind Maurya
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