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सिर्फ 9 देशों के पास ही परमाणु बम क्यों? इस ‘न्यूक्लियर क्लब’ का राज जानकर चौंक जाएंगे आप

पाकिस्तान की मेजबानी में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे तक चली अहम शांति वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने साफ कहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद मतभेद कम नहीं हो सके। इस बीच एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि आखिर दुनिया में केवल कुछ ही देशों के पास परमाणु हथियार क्यों हैं।

दुनिया का ‘न्यूक्लियर क्लब’ कौन-कौन?

इस समय दुनिया में केवल 9 देश ही ऐसे हैं जिनके पास परमाणु हथियार मौजूद हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजराइल। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का लगभग 90% हिस्सा सिर्फ अमेरिका और रूस के पास है, जो इस क्षेत्र में सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं।

NPT संधि ने रोका विस्तार

इसका सबसे बड़ा कारण Nuclear Non-Proliferation Treaty (NPT) है। 1968 में अपनाई गई और 1970 में लागू इस संधि का उद्देश्य दुनिया को परमाणु युद्ध से बचाना था। अब तक 190 से ज्यादा देश इस पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।

इस संधि के तहत केवल पांच देशों—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को ही आधिकारिक तौर पर परमाणु हथियार रखने की अनुमति दी गई, क्योंकि उन्होंने 1967 से पहले ही परमाणु परीक्षण कर लिए थे।

बाकी देश क्यों नहीं बना सकते परमाणु बम?

जो देश NPT पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, वे तकनीकी रूप से सक्षम होने के बावजूद परमाणु हथियार नहीं बना सकते, क्योंकि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा। अगर कोई देश ऐसा करता है, तो उस पर कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं।

‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ से मिलती है सुरक्षा

NPT के तहत यह व्यवस्था भी है कि जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, उनकी सुरक्षा का जिम्मा परमाणु संपन्न देश उठाते हैं। इसे ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को सुरक्षा गारंटी देता है।

भारत-पाकिस्तान ने कैसे बनाई परमाणु ताकत?

भारत और पाकिस्तान ने NPT संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए। इनका मानना था कि यह संधि भेदभावपूर्ण है। भारत ने अपनी सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए परमाणु परीक्षण किए, जिसके बाद पाकिस्तान ने भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। चूंकि ये देश NPT का हिस्सा नहीं थे, इसलिए इन पर इसकी पाबंदियां लागू नहीं हुईं।

उत्तर कोरिया और इजराइल का अलग रास्ता

उत्तर कोरिया पहले इस संधि का हिस्सा था, लेकिन बाद में बाहर निकलकर उसने परमाणु परीक्षण किए और खुद को परमाणु शक्ति घोषित किया। वहीं इजराइल ने कभी आधिकारिक तौर पर अपने परमाणु कार्यक्रम को स्वीकार नहीं किया, लेकिन माना जाता है कि उसके पास भी परमाणु हथियार हैं।

परमाणु बम बनाना इतना आसान नहीं

परमाणु हथियार बनाना सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि बेहद जटिल वैज्ञानिक और आर्थिक प्रक्रिया भी है। इसमें भारी निवेश, उन्नत तकनीक और लंबे समय तक रिसर्च की जरूरत होती है।

इसके अलावा, अगर कोई देश इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। ईरान इसका बड़ा उदाहरण है, जो अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से वैश्विक दबाव झेल रहा है।

क्यों ज्यादातर देश नहीं करते कोशिश?

इन सभी कारणों—अंतरराष्ट्रीय नियम, आर्थिक जोखिम, वैज्ञानिक चुनौतियां और सुरक्षा गारंटी—की वजह से ज्यादातर देश परमाणु हथियार बनाने के बजाय विकास और स्थिरता पर ध्यान देना बेहतर समझते हैं।

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