Monday, July 15, 2024
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Online Fraud: जानें साइबर अपराधी कैसे चुराते हैं आपकी निजी जानकारी

Online Frauds: आज डिजिटल दुनिया में अपनी ऑनलाइन पहचान और निजी जानकारियां छिपाना बेहद मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा प्रतीत होता है। साइबर अपराधी किसी न किसी तरीके से आपको ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार बना सकते हैं। भारतीय उपभोक्ता इन अपराधियों के लिए सॉफ्ट टारगेट हैं। लोकल सर्किल रिसर्च एजेंसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल लगभग 39 प्रतिशत भारतीयों के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी होती है और इन वित्तीय धोखाधड़ी की वजह से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है। सरकार और संबंधित एजेंसियां उन्हें जागरूक कर रही हैं, लेकिन साइबर अपराधी हैं कि वो ठगने के नये-नये तरीकों निकाल लाते हैं।

स्मार्टफोन ही मुसीबत की वजह?

स्मार्टफोन यूजर्स हमेशा इन साइबर अपराधियों के निशाने पर रहते हैं। हालांकि, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने वाली कंपनियां Android और Apple स्मार्टफोन के लिए लगातार सिक्योरिटी अपडेट जारी करते हैं, जो यूजर को साइबर हमलों से बचाने में मदद करते हैं। एप्पल के डिवाइसेज एंड्रॉइड की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन साइबर अपराधी इनमें भी सेंध लगाने से बाज नहीं आते हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें आईफोन के बड़े सिक्योरिटी रिस्क के बारे में सावधान किया गया था।

एप्पल डिवाइसेज के लिए एक नया मेलवेयर

रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर अपराधियों ने एप्पल डिवाइसेज के लिए एक नया मेलवेयर (वायरस) तैयार किया है, जो सिस्टम में जाकर यूजर की निजी जानकारियां इकट्ठा करता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि साइबर अपराधी इस खतरनाक वायरस को लोकप्रिय इंस्टैंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर खुले आम बेच रहे हैं। इस वायरस का नाम Atomic macOS Stealer (AMOS) है जो यूजर के सिस्टम से पासवर्ड, वॉलेट, जन्मतिथि, पता, ब्राउजर की ऑटो-फिल जानकारियां आदि आसानी से चुरा सकता है और यूजर को इसकी भयानक भी नहीं लगेगी।

खुलेआम धड़ल्ले से हो रही बिक्री

साइबर रिसर्च फर्म CRIL (Cyber Research and Intelligence Labs) ने इस खतरनाक वायरस का पता लगाया है। साइबर रिसर्चर्स ने बताया कि हैकर्स न सिर्फ इस वायरस को खुलेआम बेच रहे हैं, बल्कि समय-समय पर इसके अपडेट भी कर रहे हैं, ताकि इनके के लिए कोई जल्दी एंटिवाइरस ना तैयार हो सके। इस AMOS वायरस को हजारों डॉलर की कीमत में बेचा जा रहा है। हैकर्स द्वारा बनाया गया यह AMOS वायरस सिस्टम में .dmg फाइल को इंस्टॉल कर देता है और जानकारियां चोरी करना शुरू कर देता है।

चुराते हैं निजी जानकारियां

सोशल मैसेजिंग एप पर इस वायरस के फीचर्स को हाईलाइट करके प्रमोट किया जाता है। साइबर विशेषज्ञों की मानें तो यह वायरस लैपटॉप, कम्प्यूटर या स्मार्टफोन से पासवर्ड, कम्प्लीट सिस्टम इंफॉर्मेशन, डॉक्यूमेंट फोल्डर्स, फाइल्स और पासवर्ड आदि की जानकारियां इकट्ठा करता रहता है। इसके अलावा यह वेब ब्राउजर से ऑटो-फिल, पासवर्ड, कूकीज, वॉलेट, क्रेडिट कार्ड, और यूजर बिहेवियर आदि की जानकारी भी चुराने मे सक्षम है।

सोशल मैसेजिंग एप के अलावा साइबर क्रिमिनल्स यूजर्स की निजी जानकारियों को इकट्ठा करके डार्क वेब पर बेचते हैं। डार्क वेब पर हर साल लाखों भारतीय यूजर्स के निजी डेटा बेचे जाते हैं, जिसे साइबर अपराधी हथियार बनाकर वित्तीय धोखाधड़ी या फ्रॉड को अंजाम देते हैं। यूजर्स के डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर उन्हें टारगेट किया जाता है। यूजर की एक छोटी से गलती भी लाखों का चूना लगा सकती है।

कम्युनिकेशन माध्यम का इस्तेमाल कर अपराध को देते हैं अंजाम

साइबर अपराधी यूजर्स की निजी जानकारियां चुराने के लिए आम तौर पर कॉल्स और SMS के अलावा ई-मेल, इंस्टैंट मैसेजिंग जैसे कम्युनिकेशन माध्यम का इस्तेमाल करते हैं। यूजर्स को प्रमोशनल मैसेज और कॉल्स के जरिए झांसे में फंसाया जाता है। इसके बाद साइबर क्राइम को अंजाम दिया जाता है। इसके अलावा यूजर बिहेवियर यानि गूगल या अन्य सर्च इंजन पर किए गए वेब सर्च के आधार पर टारगेट किया जाता है। यूजर गलती से कभी-कभी किसी गलत लिंक क्लिक कर लेते हैं, तो इसके जरिए यूजर के डिवाइस में वायरस भेज दिया जाता है।

एक बार किसी डिवाइस में वायरस पहुंच जाता है, तो वो डेटा माइनिंग यानी निजी डेटा की चोरी करना शुरू कर देता है, और चोरी किए गए डेटा को डिवाइस से रिमोट सर्वर के जरिए हैकर्स के पास भेजता रहता है। हैकर्स बाद में इन डेटा को डार्क वेब पर बेचते हैं। यह तरीका लगातार चलता रहता है। इस तरह इन हैकर्स की कमाई होती है और आम लोगों को चुना लगता है।

TRAI ने टेलीकॉम कंपनियों को AI Spam Filter लगाने के दिए निर्देश

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने कुछ समय पहले ही टेलीकॉम कंपनियों एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और रिलायंस जियो को फर्जी कॉल्स और मैसेज पर रोल लगाने के लिए AI Spam Filter लगाने के निर्देश दिए हैं। जिससे फर्जी काल्स व मेसेजेस पर लगाम लग सके। कुछ टेलीकॉम कंपनियों ने इसकी टेस्टिंग भी शुरू कर दी है। TRAI ने बताया है कि फर्जी कॉल्स और मैसेज के जरिए साइबर अपराधी हर महीने करीब 1,000 से लेकर 1,500 करोड़ की धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं।

यह भी पढ़ें: AI Spam Filter: TRAI ने किया बड़ा बदलाव, फर्जी मैसेज व कॉल से मिलेगा छुटकारा

Online Fraud से बचने के तरीके

ज्यादातर साइबर अपराध के मामलों में यूजर्स की कॉमन गलती होती है। साइबर अपराधी यूजर्स को अपने झांसे में आसानी से फंसा लेते हैं और अपराध को अंजाम देते हैं। ज्यादातर यूजर्स के साथ फ्री प्रोडक्ट, कोई लुभावने पैकेज, प्रमोशन आदि का लालच देकर धोखाधड़ी की जाती है। फ्री के लालच में यूजर्स अपनी निजी जानकारियां यहां तक की वन टाइम पासवर्ड (OTP) और निजी डॉक्यूमेंट्स भी शेयर कर देते हैं। और जब तक उन्हे पता लगता है तो काफी देर हो चुकी होती है।

– अनलाइन किसी भी तरह के लुभावने ऑफर से बचे। छोटा का लालच बड़े नुकशान की वजह बन सकता है।

– अपने स्मार्टफोन, लैपटॉप आदि को समय-समय पर अपडेट करते रहना चाहिए। ऐसा करने से डिवाइस से होने वाली डेटा चोरी को रोकने में मदद मिलेगी।

– अपनी निजी जानकारियां जैसे कि बैंकिंग डिटेल्स, जन्म-तिथि, पासवर्ड आदि किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहिए।

– किसी भी अंजान नंबर से आने वाले कॉल्स और मैसेज को इग्नोर करना चाहिए और ई-मेल या अन्य ऑनलाइन मैसेजिंग प्लेटफॉर्म से मिलने वाले लिंक पर क्लिक नहीं करना चाहिए।

– अपने मोबाईल या लैपटॉप के ब्राउजर पर औटोफिल में कुछ भी सेव करने से बचे। अक्सर लोग अपना पासवर्ड या किसी फॉर्म में भारी गई डिटेल्स ब्राउजर पर सेव कर देते हैं जिससे उन्हे ये डिटेल्स हर बार ना भरना पड़े। ऐसा करना किसी रिस्क की वजह बन सकता है।

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Arvind Maurya
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