NMC Draft 2026: देश में मेडिकल शिक्षा से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना से संबंधित नियमों में संशोधन का मसौदा (Draft) जारी किया है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो अब केवल गैर-लाभकारी (Non-Profit) संस्थानों तक मेडिकल कॉलेज खोलने का अधिकार सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत लाभ कमाने वाली (For-Profit) कंपनियां भी निजी मेडिकल कॉलेज स्थापित कर सकेंगी।
एनएमसी ने इस मसौदे पर 30 दिनों के भीतर आम जनता और संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां भी आमंत्रित की हैं।
मौजूदा नियमों में क्या है व्यवस्था?
वर्तमान नियमों के अनुसार केवल कंपनी अधिनियम की धारा 8 (Section 8) के तहत पंजीकृत गैर-लाभकारी कंपनियों को ही मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की अनुमति है। ऐसी कंपनियां अपने अधिशेष धन का उपयोग केवल संस्थान के विकास और सामाजिक उद्देश्यों के लिए कर सकती हैं।
प्रस्तावित संशोधन के बाद कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत अन्य कंपनियों को भी मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति मिल सकती है।
2017 में भी हो चुका है ऐसा प्रयास
यह पहली बार नहीं है जब कंपनियों को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति देने का प्रस्ताव सामने आया है। वर्ष 2017 में तत्कालीन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने भी नियमों में बदलाव करते हुए कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत कंपनियों को मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की अनुमति दी थी।
उस समय ट्रस्ट और सोसायटी को कंपनी में बदलने का विकल्प भी दिया गया था। हालांकि, वर्ष 2019 में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के गठन के बाद नए नियम लागू हुए और यह अनुमति फिर से केवल सेक्शन-8 कंपनियों तक सीमित कर दी गई।
सरकार ने बदलाव की क्या बताई वजह?
सरकार का तर्क है कि केवल गैर-लाभकारी संस्थानों को अनुमति मिलने के कारण बड़ी निजी कंपनियां मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने से बचती हैं। सरकार का यह भी कहना है कि कई संस्थानों में लाभ कमाने की प्रक्रिया पहले से मौजूद है, लेकिन वह पारदर्शी तरीके से सामने नहीं आती।
ऐसे में यदि कंपनियों को कानूनी रूप से अनुमति मिलती है, तो निवेश बढ़ेगा, व्यवस्था अधिक पारदर्शी होगी और सरकार को कर (Tax) के रूप में भी अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा।
फीस बढ़ने की आशंका पर फिर शुरू हुई बहस
एनएमसी के प्रस्ताव के बाद सबसे बड़ी चिंता मेडिकल शिक्षा की फीस को लेकर सामने आई है। देश के कई डीम्ड विश्वविद्यालय और निजी मेडिकल कॉलेज ट्रस्ट एवं सोसायटी के माध्यम से संचालित होते हैं, लेकिन उनकी फीस पहले से ही काफी अधिक है। इन संस्थानों की फीस पर राज्यों का सीधा नियंत्रण नहीं होता और इनमें सरकारी कोटे की कम फीस वाली सीटें भी उपलब्ध नहीं होतीं।
ऐसे में विशेषज्ञों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि यदि लाभ कमाने वाली कंपनियों को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति मिलती है, तो क्या मेडिकल शिक्षा और अधिक महंगी हो सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट और सरकार का पहले क्या रहा है रुख?
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1993 और 2001 के अपने फैसलों में कहा था कि शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनाया जा सकता और शैक्षणिक संस्थानों को मुनाफाखोरी की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, संस्थानों को अपने विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए उचित अधिशेष रखने की छूट दी गई थी।
वर्ष 2009 तक केंद्र सरकार का भी यही रुख था कि शिक्षा लाभ कमाने का माध्यम नहीं हो सकती। बाद में वर्ष 2010 में कंपनियों को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति दी गई, लेकिन यह स्पष्ट किया गया था कि यदि कोई संस्थान शिक्षा का व्यवसायीकरण करता है, तो उसकी अनुमति वापस ली जा सकती है।
अंतिम फैसला अभी बाकी
फिलहाल एनएमसी का यह केवल एक मसौदा प्रस्ताव है। अंतिम निर्णय सार्वजनिक सुझावों और आपत्तियों पर विचार करने के बाद लिया जाएगा। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो एक ओर मेडिकल शिक्षा में निजी निवेश और नए कॉलेजों की संख्या बढ़ सकती है, वहीं दूसरी ओर फीस और शिक्षा के व्यवसायीकरण को लेकर बहस और तेज होने की संभावना है।
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