School Sex Education: देश के स्कूलों में जल्द ही व्यापक यौन शिक्षा (Comprehensive Sex Education) को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि इस विषय पर 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है। अब अदालत की अंतिम मंजूरी मिलने के बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
यह मामला किशोरों के अधिकारों, जागरूकता और पॉक्सो (POCSO) कानून के कथित दुरुपयोग से जुड़ी चिंताओं के बीच सामने आया है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के निजता के अधिकार से जुड़े मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।
अदालत की मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि 15 से 18 वर्ष के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को बिना पर्याप्त विचार के गंभीर आपराधिक मामलों में बदलने से कैसे रोका जाए। इसी संदर्भ में कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्कूलों में यौन शिक्षा की स्थिति और भविष्य की योजना पर जानकारी मांगी थी।
26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने तैयार किया रोडमैप
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया। इस समिति की अध्यक्षता महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव ने की। समिति में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के विशेषज्ञ, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया।
समिति को पॉक्सो कानून से जुड़े मामलों में किशोरों के अधिकारों की सुरक्षा, जागरूकता बढ़ाने और व्यावहारिक समाधान सुझाने की जिम्मेदारी दी गई थी।
किशोरों के अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की आयु शारीरिक और मानसिक बदलावों का महत्वपूर्ण दौर होती है। अदालत ने कहा कि पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन कई मामलों में आपसी सहमति वाले किशोर संबंधों में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार 16 से 18 वर्ष के किशोर-किशोरियां घर से भागकर शादी कर लेते हैं या संबंध बना लेते हैं। ऐसे मामलों में परिवार के सदस्य कथित पारिवारिक सम्मान के नाम पर लड़कों के खिलाफ पॉक्सो के तहत मामला दर्ज करा देते हैं। इससे नाबालिग लड़कों का भविष्य और करियर गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। अदालत का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए शुरुआती स्तर पर सही शिक्षा और जागरूकता आवश्यक है।
विशेषज्ञ समिति की प्रमुख सिफारिशें
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत एनसीईआरटी नया पाठ्यक्रम तैयार करेगा।
सिफारिशों में प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को शरीर के अंगों, व्यक्तिगत स्वच्छता और ‘सेफ टच’ एवं ‘अनसेफ टच’ की जानकारी देने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा स्कूलों में एक प्रशिक्षित विशेषज्ञ शिक्षक नियुक्त करने की सिफारिश की गई है, जो सप्ताह में कम से कम दो बार 15 से 20 मिनट की विशेष कक्षाएं संचालित करेगा।
रिपोर्ट में माता-पिता और शिक्षकों के लिए विशेष ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित करने का भी सुझाव दिया गया है, ताकि इस विषय को लेकर समाज में मौजूद झिझक कम हो सके।
इसके साथ ही किशोरों को आपसी सहमति, व्यक्तिगत सीमाएं, कानूनी परिणाम और शारीरिक एवं मानसिक बदलावों के बारे में जागरूक करने की सिफारिश की गई है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और अनजाने में कानून का उल्लंघन करने वाली परिस्थितियों से बच सकें।
अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और सरकार के पक्ष पर विस्तार से विचार करने के बाद आवश्यक निर्देश जारी करेगा। सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने दोहराया कि कम उम्र के बच्चों और किशोरों को कठोर पॉक्सो कानून के अनावश्यक दायरे में आने से बचाना जरूरी है तथा हर मामले का समाधान केवल पुलिस कार्रवाई नहीं हो सकता।
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