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Supreme Court Vehicle Recovery Rules: EMI नहीं भरी तो क्या बैंक जबरदस्ती छीन सकता है गाड़ी? Supreme Court का बड़ा फैसला

आज के समय में बड़ी संख्या में लोग कार, बाइक, ट्रक और दूसरी कमर्शियल गाड़ियां खरीदने के लिए बैंक या फाइनेंस कंपनियों से लोन लेते हैं। इसकी EMI हर महीने चुकानी होती है। कई बार आर्थिक परेशानी या किसी अन्य वजह से ग्राहक किस्त समय पर नहीं भर पाता। ऐसे में फाइनेंसर को बकाया रकम वसूलने और कानून के तहत वाहन पर दोबारा कब्जा लेने का अधिकार हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इसके लिए बल, धमकी या गैरकानूनी तरीका नहीं अपनाया जा सकता।

क्या EMI डिफॉल्ट पर बैंक जब्त कर सकता है गाड़ी?

सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2026 को एक मामले में कहा कि हाइपोथिकेटेड वाहन को दोबारा कब्जे में लेने का अधिकार बल या धोखे के जरिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वाहन की जब्ती कानूनी तरीके और लागू नियमों के अनुरूप होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लोन एग्रीमेंट में repossession का प्रावधान होने से फाइनेंसर को मनमाने तरीके से वाहन उठाने की खुली छूट नहीं मिल जाती।

यह मामला एक ट्रक मालिक से जुड़ा था, जिसने 2019 में कमर्शियल वाहन खरीदने के लिए Cholamandalam Investment and Finance Company Limited से लोन लिया था। EMI में डिफॉल्ट के बाद 2023 में उसके ट्रक को कथित तौर पर रात करीब 1 बजे बिना पूर्व नोटिस के कब्जे में लिया गया। मामले के अनुसार, ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़कर उसे वहां से ले जाया गया और बाद में वाहन बेच दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वाहन कब्जे में लेने से पहले सात दिन का नोटिस नहीं दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से वाहन वापस लेने की प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी।

सिर्फ लोन एग्रीमेंट के भरोसे नहीं छीनी जा सकती गाड़ी

सुप्रीम कोर्ट ने repossession clause की वैधता पर भी महत्वपूर्ण बातें कहीं। कोर्ट के मुताबिक, वाहन दोबारा कब्जे में लेने की शर्त में नोटिस की अवधि, कब्जा लेने की प्रक्रिया और वाहन की बिक्री से पहले कर्जदार को भुगतान का अंतिम अवसर जैसे सुरक्षा उपाय होने चाहिए।

अदालत ने संबंधित लोन एग्रीमेंट की उस व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई, जिसमें डिफॉल्ट होने पर बिना नोटिस के वाहन पर अधिकार समाप्त होने की बात थी। कोर्ट ने माना कि ऐसी शर्त कर्जदार को फाइनेंसर की एकतरफा इच्छा पर छोड़ देती है और निर्धारित प्रक्रियात्मक सुरक्षा को कमजोर करती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि EMI डिफॉल्ट होने पर बैंक या फाइनेंस कंपनी वाहन कभी जब्त नहीं कर सकती। फाइनेंसर के पास लोन एग्रीमेंट और लागू कानूनों के तहत अपने बकाये की वसूली तथा वाहन को दोबारा कब्जे में लेने के अधिकार हो सकते हैं। लेकिन कार्रवाई तय कानूनी प्रक्रिया के तहत करनी होगी।

Recovery Agents के लिए भी नियम लागू

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में RBI की पुरानी रिकवरी गाइडलाइंस का भी उल्लेख किया। अदालत ने पहले के फैसलों और RBI के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि कर्ज की वसूली के लिए अनुचित उत्पीड़न या muscle power का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि बैंक को वाहन का कब्जा लेने के लिए कानून द्वारा मान्य प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

इसका सीधा मतलब है कि बैंक या फाइनेंस कंपनी के रिकवरी एजेंट ग्राहक को धमकाकर, जबरदस्ती करके या गैरकानूनी तरीके से वाहन अपने कब्जे में नहीं ले सकते। वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी है कि उनके लिए काम करने वाले रिकवरी एजेंट भी लागू नियमों और दिशानिर्देशों का पालन करें।

Supreme Court ने RBI को भी दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने RBI को निर्देश दिया कि बैंकों और NBFCs द्वारा रिकवरी से जुड़े दिशानिर्देशों, Master Circulars और Clarifications का प्रभावी तरीके से पालन सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाएं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे दिशानिर्देश मौजूद होने के बावजूद इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं।

अदालत ने मामले में ट्रक मालिक को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश भी दिया। साथ ही कंपनी को दोनों लोन अकाउंट बंद करने और वाहन की बिक्री से मिले 4.50 लाख रुपये की रकम 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ वापस करने का निर्देश दिया। मामले में 50 हजार रुपये की लागत भी लगाई गई।

EMI बकाया होने पर ग्राहक क्या करे?

अगर किसी व्यक्ति की EMI बकाया हो जाती है तो उसे समस्या को नजरअंदाज करने के बजाय बैंक या फाइनेंस कंपनी से संपर्क करना चाहिए। बकाया रकम, भेजे गए नोटिस और वाहन की repossession से जुड़ी प्रक्रिया की जानकारी लेना महत्वपूर्ण है।

वहीं, अगर कोई रिकवरी एजेंट धमकी देता है या कानून से बाहर जाकर जबरदस्ती वाहन कब्जे में लेने की कोशिश करता है, तो ग्राहक उपलब्ध कानूनी उपायों की मदद ले सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मुख्य बिंदु यह है कि फाइनेंसर का बकाया वसूलने का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन वाहन की जब्ती के लिए कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।

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Arvind Maurya
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