Health Insurance Claim: हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले करोड़ों लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब बीमा कंपनियां किसी भी हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम को बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज नहीं कर सकेंगी। बीमा नियामक IRDAI ने नए निर्देश जारी करते हुए कंपनियों को क्लेम रिजेक्शन के पीछे ठोस वजह बताना अनिवार्य कर दिया है। इस कदम का उद्देश्य पॉलिसीधारकों के अधिकारों को मजबूत करना और क्लेम प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना है।
बढ़ते क्लेम रिजेक्शन के बीच आया नया नियम
पिछले कुछ वर्षों में हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कोरोना महामारी के बाद लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ी, जिसके चलते लाखों लोगों ने हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां खरीदीं।
हालांकि, महंगा प्रीमियम चुकाने के बावजूद कई पॉलिसीधारकों को क्लेम से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में IRDAI ने बीमा कंपनियों के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान बीमा कंपनियों के पास कुल 3.26 करोड़ हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम दाखिल किए गए। इन दावों के बदले करीब 94,248 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
इसके बावजूद लगभग 8 प्रतिशत क्लेम खारिज कर दिए गए। इसका अर्थ है कि हर 12 पॉलिसीधारकों में से लगभग एक व्यक्ति को क्लेम का भुगतान नहीं मिल पाया।
IRDAI ने कंपनियों को क्या निर्देश दिए?
Insurance Regulatory and Development Authority of India ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बीमा कंपनी क्लेम अस्वीकार करती है तो उसे इसके पीछे का सटीक और मजबूत कारण बताना होगा।
साथ ही कंपनी को यह भी स्पष्ट करना होगा कि पॉलिसी की किस शर्त या प्रावधान के आधार पर क्लेम को खारिज किया गया है। अब केवल सामान्य या अस्पष्ट कारण देकर क्लेम रिजेक्ट करना आसान नहीं होगा।
पॉलिसीधारकों को क्या मिलेगा फायदा?
नए नियमों के लागू होने के बाद पॉलिसीधारकों के लिए यह समझना आसान होगा कि उनका क्लेम वास्तव में सही कारणों से खारिज किया गया है या नहीं।
यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसका क्लेम अनुचित तरीके से अस्वीकार किया गया है, तो वह संबंधित शिकायत निवारण मंचों या इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के पास मामला ले जा सकता है। इससे ग्राहकों को अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।
कैशलेस क्लेम पर भी सख्ती
IRDAI ने केवल क्लेम रिजेक्शन ही नहीं, बल्कि क्लेम प्रोसेसिंग की समयसीमा को लेकर भी सख्त निर्देश दिए हैं।
नए नियमों के तहत बीमा कंपनियों को:
- कैशलेस प्री-ऑथराइजेशन अनुरोध पर एक घंटे के भीतर फैसला लेना होगा।
- अस्पताल से अंतिम दस्तावेज मिलने के बाद तीन घंटे के भीतर डिस्चार्ज संबंधी निर्णय की जानकारी देनी होगी।
इससे मरीजों और उनके परिवारों को अस्पताल में अनावश्यक इंतजार से राहत मिलने की उम्मीद है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे बीमा कंपनियों की जवाबदेही बढ़ेगी और पॉलिसीधारकों को क्लेम प्रक्रिया में अधिक भरोसा मिलेगा।
विशेष रूप से उन लोगों के लिए यह राहतभरी खबर है जो वर्षों तक प्रीमियम भरने के बाद क्लेम रिजेक्शन का सामना करते हैं और उन्हें कारण तक स्पष्ट रूप से नहीं बताया जाता।
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