Bra MRP Case: दिल्ली की एक महिला को ब्रा की कीमत को लेकर दुकानदार से बहस करना महंगा जरूर पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना दावा छोड़ने से इनकार कर दिया। खरीदारी के बाद जब महिला ने बिल और प्रोडक्ट पर दर्ज MRP में अंतर देखा तो उन्होंने मामले को कंज्यूमर कोर्ट तक पहुंचाया। सुनवाई के दौरान बिल, प्राइस टैग और GPay पेमेंट रिकॉर्ड महिला के पक्ष में अहम सबूत साबित हुए।
कोर्ट ने माना कि स्टोर ने प्रोडक्ट पर दर्ज MRP से 400 रुपये अधिक वसूले थे। इसके बाद स्टोर को अतिरिक्त वसूली गई रकम लौटाने के साथ महिला को परेशानी और मुकदमे के खर्च के लिए 20 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
₹1,495 की MRP वाली Bra के लिए वसूले ₹1,895
महिला ने 3 मार्च 2024 को दिल्ली के लाजपत नगर स्थित एक लिंगरी स्टोर से दो ब्रा खरीदी थीं। इनमें से एक प्रोडक्ट पर 1,495 रुपये की MRP दर्ज थी, लेकिन दुकान की ओर से दिए गए बिल में उसी ब्रा की कीमत 1,895 रुपये लिखी गई थी।
यानी प्रोडक्ट की MRP से 400 रुपये अधिक वसूले गए। महिला ने दोनों ब्रा की खरीदारी के लिए कुल 3,395 रुपये का भुगतान GPay के जरिए किया था। घर पहुंचने के बाद बिल देखने पर उन्हें कीमत में यह अंतर नजर आया और उन्होंने दुकानदार के खिलाफ शिकायत करने का फैसला किया।
स्टोर ने महिला के Customer होने पर ही उठाया सवाल
मामला कंज्यूमर कोर्ट पहुंचने के बाद स्टोर की ओर से महिला के दावे पर कई सवाल उठाए गए। स्टोर ने महिला के ग्राहक होने पर भी आपत्ति जताई। उसका कहना था कि बिल पर ग्राहक का नाम ILMA दर्ज है, जबकि महिला ने अपना नाम कुछ और बताया था।
स्टोर ने यह तर्क भी दिया कि महिला ने खरीदारी के तुरंत बाद उनसे संपर्क नहीं किया और करीब पांच महीने बाद कानूनी नोटिस भेजा। हालांकि, महिला ने अपने दावे के समर्थन में ऐसे दस्तावेज पेश किए, जिनसे खरीदारी और भुगतान की जानकारी को जोड़ा जा सका।
GPay और Price Tag बने सबसे बड़े सबूत
महिला ने कोर्ट के सामने GPay से किए गए भुगतान का रिकॉर्ड और ब्रा का प्राइस टैग पेश किया। कोर्ट ने पाया कि GPay के जरिए किया गया 3,395 रुपये का भुगतान बिल में दर्ज कुल रकम से मेल खाता था।
इसके अलावा प्रोडक्ट पर मौजूद प्राइस टैग और बिल में दर्ज जानकारी भी मामले में महत्वपूर्ण साबित हुई। इन दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट ने माना कि संबंधित ब्रा के लिए MRP से 400 रुपये ज्यादा वसूले गए थे।
Consumer Court ने महिला के पक्ष में सुनाया फैसला
कोर्ट की अध्यक्ष मोनिका ए. श्रीवास्तव और सदस्य किरण कौशल ने मामले में महिला के पक्ष में फैसला सुनाया। आदेश में कहा गया, “मर्द झूठ बोल सकते हैं, लेकिन डॉक्यूमेंट्स नहीं.”
कोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर स्टोर को अतिरिक्त 400 रुपये की वसूली के लिए जिम्मेदार माना। फैसले ने एक बार फिर यह दिखाया कि खरीदारी से जुड़े बिल, प्राइस टैग और डिजिटल पेमेंट रिकॉर्ड उपभोक्ता विवाद में महत्वपूर्ण सबूत साबित हो सकते हैं।
महिला को वापस मिलेंगे ₹400, साथ में ₹20 हजार मुआवजा
कंज्यूमर कोर्ट ने स्टोर को महिला से अतिरिक्त लिए गए 400 रुपये वापस करने का आदेश दिया है। इस रकम पर 3 मार्च 2024 से 8 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
अगर स्टोर तीन महीने के भीतर भुगतान नहीं करता है तो ब्याज की दर बढ़कर 10 प्रतिशत सालाना हो जाएगी। इसके अलावा महिला को हुई परेशानी और मुकदमे के खर्च की भरपाई के लिए कोर्ट ने 20 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया है।
इस मामले में महिला के पास मौजूद बिल, प्राइस टैग और डिजिटल भुगतान का रिकॉर्ड उनके लिए निर्णायक साबित हुआ। मामले से यह भी साफ होता है कि खरीदारी के बाद बिल और प्रोडक्ट पर दर्ज कीमत की जांच करना और भुगतान का रिकॉर्ड संभालकर रखना उपभोक्ता विवाद की स्थिति में बेहद उपयोगी हो सकता है।
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